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आप थाने जाते हैं, अपनी परेशानी बताते हैं। पुलिस सुनती है और कह देती है — ये मामला नहीं बनता, कल आना पहले जाँच करेंगे। यहीं से आम आदमी डर जाता है। लेकिन कानून यहाँ आपके साथ खड़ा होता है।
BNSS 2023 (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता) ने साफ कर दिया है कि--
किसी संज्ञेय अपराध की सूचना मिलने पर पुलिस FIR दर्ज करने के लिए बाध्य है।
मतलब--
पुलिस जाँच से पहले FIR से मना नहीं कर सकती
पहले पूछताछ होगी, कहना कानून के खिलाफ है
संज्ञेय अपराध में FIR दर्ज करना अनिवार्य है। BNSS 2023 ने इसी फैसले को कानून का हिस्सा बना दिया।
मौखिक नहीं, लिखित में शिकायत दीजिए ,तारीख और हस्ताक्षर जरूर हों ,एक copy अपने पास रखें यह बाद में आपका सबसे बड़ा सबूत बनता है।
अगर थाना FIR नहीं लिखता-
BNSS धारा 173(4) के अनुसार आप अपनी शिकायत--
पुलिस अधीक्षक (SP)
या DCP को डाक / ई-मेल से भेज सकते हैं
कई मामलों में यहीं FIR दर्ज हो जाती है।
अगर पुलिस फिर भी टालमटोल करे-
BNSS धारा 210 (पुरानी CrPC 156(3)
आप न्यायिक मजिस्ट्रेट के पास आवेदन दे सकते हैं।
कोर्ट-
पुलिस को FIR दर्ज करने का आदेश दे सकती है
और जाँच भी शुरू करवा सकती है
यह कानूनी और सुरक्षित रास्ता है।
हाँ, कुछ मामलों में। अगर पुलिस-
जानबूझकर FIR दर्ज नहीं करती--
पीड़ित को भटकाती है तो यह कर्तव्य में लापरवाही और कुछ हालात में BNS (भारतीय न्याय संहिता) के तहत दंडनीय भी हो सकता है।
महिला अपराध ,SC/ST अत्याचार ,इन मामलों में FIR न लिखना-
गंभीर कानूनी गलती मानी जाती है
संबंधित पुलिस अधिकारी पर कार्रवाई हो सकती है
Q. क्या हर शिकायत पर FIR जरूरी है ?
नहीं, केवल संज्ञेय अपराध में।
Q. क्या FIR ऑनलाइन दर्ज हो सकती है ?
हाँ, कई राज्यों में e-FIR की सुविधा है।
Q. क्या FIR के बिना केस कोर्ट में जा सकता है ?
मजिस्ट्रेट के आदेश से जा सकता है।
FIR आपका अधिकार है, पुलिस की कृपा नहीं।
अगर आप डरेंगे, तो मामला दब जाएगा। अगर आप कानून जानेंगे, तो रास्ता खुलेगा।
यह लेख BNSS 2023, सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों और नागरिक अधिकारों पर आधारित है।
इसका उद्देश्य आम नागरिक को सरल भाषा में कानूनी जानकारी देना है, न कि कानूनी सलाह।
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