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| Judicial Review – भारतीय संविधान में न्यायिक पुनरावलोकन की शक्ति |
क्या संसद या सरकार द्वारा बनाए गए हर कानून को अंतिम माना जाए ? या कोई संस्था है जो यह जांच सके कि वह संविधान के अनुरूप है या नहीं?
भारत में इस शक्ति को कहते हैं Judicial Review (न्यायिक पुनरावलोकन)। यह भारतीय लोकतंत्र की सबसे महत्वपूर्ण संवैधानिक व्यवस्थाओं में से एक है।
न्यायालयों की वह शक्ति जिसके माध्यम से वे किसी भी कानून, कार्यपालिका के आदेश या
संवैधानिक संशोधन की वैधता की जांच कर सकते हैं। यदि कोई कानून संविधान के विरुद्ध पाया जाता है, तो न्यायालय उसे अवैध ,Unconstitutional घोषित कर सकता है।
भारत में Judicial Review का स्पष्ट उल्लेख कई अनुच्छेदों में मिलता है -
यह कहता है कि मौलिक अधिकारों के विरुद्ध कोई भी कानून शून्य होगा।
यह नागरिकों को सीधे सुप्रीम कोर्ट जाने का अधिकार देता है।
यह उच्च न्यायालयों को रिट जारी करने की शक्ति देता है।
इस केस में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संसद की संशोधन शक्ति असीमित नहीं है।
न्यायालय ने कहा कि सीमित संशोधन शक्ति स्वयं संविधान की मूल संरचना का हिस्सा है।
यहाँ न्यायालय ने स्पष्ट किया कि 9वीं अनुसूची में डाले गए कानून भी न्यायिक समीक्षा से बाहर नहीं हैं।
कुछ लोग कहते हैं इससे न्यायपालिका अत्यधिक शक्तिशाली हो जाती है ,यह संसद की सर्वोच्चता को सीमित करता है , लेकिन समर्थकों का तर्क है कि यही लोकतंत्र की सुरक्षा है।
Judicial Review केवल एक कानूनी प्रक्रिया नहीं है ,यह संविधान और नागरिकों के बीच विश्वास की कड़ी है। अगर यह शक्ति न हो, तो कोई भी असंवैधानिक कानून नागरिकों के अधिकारों को कमजोर कर सकता है। इसलिए, Judicial Review भारतीय लोकतंत्र का सुरक्षा कवच है।
एक जागरूक नागरिक और संविधान अध्ययन के विद्यार्थी के रूप में मेरा मानना है कि Judicial Review लोकतंत्र की वह सुरक्षा रेखा है, जो सत्ता को सीमाओं में रखती है।
Q1- क्या संसद Judicial Review को समाप्त कर सकती है ?
नहीं, क्योंकि यह संविधान की मूल संरचना का हिस्सा माना जाता है।
Q2- क्या हाई कोर्ट भी Judicial Review कर सकता है -?
हाँ, Article 226 के तहत।
Q3- क्या हर कानून न्यायिक समीक्षा के अधीन है -?
हाँ, यदि वह संविधान से टकराता है।
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