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| 1985 का ऐतिहासिक शाह बानो केस जिसने भारतीय कानून और राजनीति में बड़ा बदलाव किया। |
लेकिन समाज के संदर्भ में यह महिला गरिमा और संवैधानिक सर्वोच्चता की परीक्षा थी।
शाह बानो मामला भारत के सबसे चर्चित और विवादास्पद सुप्रीम कोर्ट के फैसलों में से एक है।
यह मामला केवल गुजारा भत्ता (Maintenance) का नहीं था बल्कि-
मुस्लिम पर्सनल लॉ
महिलाओं के अधिकार
धर्म और संविधान
संसद बनाम सुप्रीम कोर्ट , इन सभी मुद्दों से जुड़ा हुआ था।
पूरा केस आधिकारिक रूप से जाना जाता है-
वर्ष: 1985
अदालत: Supreme Court of India
मुख्य न्यायाधीश: Y. V. Chandrachud
शाह बानो, 62 वर्षीय मुस्लिम महिला थीं।
उनके पति मोहम्मद अहमद खान ने 1978 में उन्हें तीन तलाक दे दिया।
तलाक के बाद उन्होंने गुजारा भत्ता देना बंद कर दिया।
शाह बानो ने CrPC की धारा 125 के तहत मजिस्ट्रेट कोर्ट में याचिका दायर की।
धारा 125 CrPC (अब BNSS में समाहित) कहती है-
यदि कोई व्यक्ति अपनी पत्नी, बच्चों या माता-पिता का पालन-पोषण नहीं करता, तो अदालत उसे गुजारा भत्ता देने का आदेश दे सकती है।
यह एक धर्म-निरपेक्ष (secular) प्रावधान है — यानी सभी धर्मों पर लागू।
मजिस्ट्रेट कोर्ट ने शाह बानो के पक्ष में फैसला दिया। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने भी आदेश बरकरार रखा।
पति ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा--
1. धारा 125 CrPC सभी नागरिकों पर लागू होती है।
2. मुस्लिम महिला भी Maintenance की हकदार है।
3. केवल इद्दत अवधि ,तक सीमित नहीं किया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने ₹179.20 प्रति माह देने का आदेश दिया था।
राशि भले कम थी-
लेकिन सिद्धांत बड़ा था — कानून सबके लिए समान है।
इस फैसले के बाद देश में बड़ा विवाद हुआ।
मुस्लिम संगठनों ने विरोध किया कि-
यह मुस्लिम पर्सनल लॉ में हस्तक्षेप है।
तब केंद्र सरकार (राजीव गांधी सरकार) ने 1986 में एक नया कानून पारित किया --
इस कानून ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को सीमित कर दिया।
बाद में सुप्रीम कोर्ट ने अन्य मामलों में स्पष्ट किया कि- यदि महिला खुद को maintain नहीं कर सकती, तो पति को उचित गुजारा भत्ता देना होगा।
इस प्रकार, धीरे-धीरे शाह बानो निर्णय की मूल भावना को फिर से मजबूत किया गया।
यह मामला जुड़ा था- समानता के अधिकार जीवन और गरिमा के अधिकार धार्मिक स्वतंत्रता यह केस भारत में संविधान बनाम व्यक्तिगत कानून” की बहस का प्रतीक बन गया।
1. महिलाओं के अधिकार
2. धर्मनिरपेक्ष कानून की पुष्टि
3. संसद और न्यायपालिका का टकराव
4. Uniform Civil Code
सुप्रीम कोर्ट ने ₹179.20 प्रति माह का आदेश दिया था।
1986 के कानून से सीमित किया गया, लेकिन बाद में न्यायालय ने व्यापक व्याख्या की।
क्योंकि यह संविधान, धर्म और महिला अधिकारों से जुड़ा landmark फैसला है।
इसने यह स्पष्ट किया कि=
कानून और न्याय, धर्म से ऊपर हैं जब बात नागरिक अधिकारों की हो।
Q. शाह बानो केस कब हुआ था ?
Q. सुप्रीम कोर्ट ने क्या फैसला दिया ?
Q. Muslim Women Act 1986 क्यों लाया गया ?
Q. क्या धारा 125 CrPC सभी धर्मों पर लागू है ?
Article 21 क्या है? | जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार | Indian Constitution
Very useful
ReplyDeleteVery good
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